2594 Lynn Ogden Lane

Blog Details

Home   /   पोषण का संकट


वैश्विक भूख सूचकांक में भारत की रैंकिंग को लेकर चिंता जाहिर करना वाजिब ही है। हर साल जारी होंने वाले इस सूचकांक में भारत
को इस बार 117 देशों में से 102वां स्थान मिला है। इसका मतलब कि भूख की तड़प एवं उसके विस्तार पर काबू कर पाने में केवल 15 देश ही भारत से पीछे हैं। भारत वर्ष 2010 में 95वें पायदान पर था।
इस सूचकांक में बच्चों का कद के अनुपात में कम वजन, उम्र के अनुपात में कम दिखना या बौनापन, बाल मृत्यु दर और जरूरत से कम पोषण जैसे तमाम संकेतक शामिल होते हैं। यह संभव है कि इन पैमानों पर कुल रैंकिंग भारांक या गणना-पद्धति
में छोटे बदलावों के प्रति संवेदनशील हो। लेकिन सूचकांक में शामिल घटकों के अलग-अलग रुझान भी परेशान करते हैं। अनुपात में वजन का पैमाना अधिक परेशान करता है।रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2012 के पहले 16.5 फीसदी बच्चों का वजन कद के अनुपात में नहीं था, वहीं 2014 के बाद से ऐसे बच्चों की संख्या 20 फीसदी से अधिक हो चुकी है। इसके अलावा छः महीने से लेकर दो साल तक के 90 फीसदी बच्चों को न्यूनतम स्वीकार्य आहार भी नहीं मिल पा रहा। यहां यह खास तौर पर उल्लेखनीय है। कि ये आंकड़े मोटें तौरं पर राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण जैसे स्रोतों से हासिल संकेतकों से मेल ही खाते हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस मसले पर सरकारों की लगातार कोशिशों के बावजूद समुचित प्रगति नहीं हो पाई है । साफ- सफाई से जुड़ी समस्याएं भी कुपोषण की एक वजह हो सकती हैं। लेकिन रिपोर्ट बताती है कि खुले में शौच का सिलसिला अब भी जारी है, जिसका पोषण पर भयावह असर होता है। भारत को बुनियादी मसलों पर जोर देना होगा और खाद्य वितरण की समस्याओं को हल करना होगा। अब यह सुनिश्चित करने पर जोर होना चाहिए कि कुपोषण का जोखिम झेल रहे बच्चों समेत तमाम भारतीयों को संतुलित एवं पोषक आहार मिले। दोपहर में बच्चों को सब्जियों एवं प्रोटीन से भरपूर गरम खाना परोसना, भूख से जुड़े सवाल हल करने का बढ़िया शुरुआती बिंदु होगा।.

Posted in Uncategorized